मुहपति का पडिलेहन क्यो करते है
मुहपति का पडिलेहन अहिंसा और सावधानी (समिति) के लिए किया जाता है। सीधी‑सी बात में कारण ऐसे हैं:
- अनंत सूक्ष्म जीवों की रक्षा के लिए
- मुहपति कपड़े का होता है, उसमें नमी, लार, सांस की भाप आदि के कारण बहुत सूक्ष्म जीव लग सकते हैं। - पडिलेहन करते समय उसे खोलकर, उलट‑पुलट कर, हल्के से झाड़कर देखा जाता है कि कहीं कीड़े, रुई के गोले, धूल, बाल आदि तो नहीं लगे। - इससे उन जीवों की अनजाने में हत्या होने से बचाव होता है — यह अहिंसा की सीधी साधना है।
- मुंह से निकलने वाली हिंसा को घटाने के लिए
- बोलते समय मुंह से हवा, लार की बूँदें, सूक्ष्म कीटाणु आदि निकलते हैं। - साफ और सही तरह से रखा हुआ मुहपति उन्हें रोकने में मदद करता है। - अगर मुहपति गंदा हो, मुड़ा‑तुड़ा हो, ठीक से लगाया न जाए तो उसका उद्देश्य ही पूरा नहीं होता; इसलिए पहले पडिलेहन करके उसे ठीक से लगाया जाता है।
- शुद्धि और सावधानी की आदत के लिए
- जैन आचार में “समिति” (सावधानी) और “गुप्ति” (इन्द्रियों की रक्षा) बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। - बार‑बार पडिलेहन करने से मन में यह भाव बैठता है कि हर छोटी‑छोटी चीज़ में भी हमें सजग रहना है – चलने, बोलने, बैठने, खाने, हर जगह।
- आराधना और शिष्टाचार के लिए
- गुरु‑भगवंत, जिनालय या धर्मसभा के सामने गंदा या मुड़ा हुआ मुहपति रखना अशोभनीय माना जाता है। - पडिलेहन से मुहपति सुव्यवस्थित, साफ और मर्यादा‑योग्य रूप में रखा जाता है, जो आंतरिक श्रद्धा और आदर का भी चिह्न है।
संक्षेप में: मुहपति का पडिलेहन इसलिए किया जाता है कि उससे किसी भी जड़‑चेतन जीव की हिंसा कम से कम हो, मुंह से होने वाली हिंसा घटे, और साधक में निरंतर शुद्धि व सावधानी की भावना बनी रहे।
मुहपति जैन साधु‑साध्वियों के मुख्य “उपकरण” में से एक है। उपकरण के बारे में आप विस्तार से पढ़ना चाहें तो यहाँ देख सकते हैं: