जैन पाचखान संकल्प
“पाचखान / पचक्खाण संकल्प” का सरल अर्थ समझें:
1. पाचखान / पचक्खाण क्या है?
जैन धर्म में पचक्खाण (पच्छखाण / पाचखान) = प्रत्याख्यान / नियम लेना अर्थात – देव, गुरु, धर्म को साक्षी मानकर किसी नियम या व्रत को निश्चित समय के लिए दृढ़ संकल्प से स्वीकार करना।जैसे:
- आज मैं अमुक समय तक अन्न/जल नहीं लूँगा
- आज मैं फलाना तप करूँगा (उपवास, एकासना, अठाई आदि)
- आज मैं अमुक प्रकार का त्याग रखूँगा (रात्रीभोजन, कंद-मूल, मिठाई आदि)
इसी संकल्प/नियम को सामान्य भाषा में पचखान / पचकान / पचक्खाण संकल्प कहा जाता है।
आप इस पर और विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं
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2. यह “पाँचखान” क्यों कहा जाता है?
बहुत बार गृहस्थ जब नियम लेते हैं तो पाँच मुख्य बातों पर संकल्प करते हैं, जैसे:- काय (शरीर) से अहिंसा और संयम
- वचन (बोली) से असत्य, कटु वाणी का त्याग
- मन (भाव) से राग–द्वेष कम करना
- भोजन-पान में नियम (कितनी बार, किस समय, क्या लें, क्या न लें)
- धीरे–धीरे मोक्षमार्ग की ओर बढ़ने का भाव
इन पाँच प्रकार के संकल्पों के कारण कई जगह इसे बोलचाल में “पाँचखान” (पाचखान) संकल्प भी कहा जाता है।
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3. संप्रदाय के अनुसार नाम का थोड़ा अंतर
- श्वेतांबर (विशेषकर तेरापंथ, स्थानकवासी आदि):
- दिगंबर परंपरा:
भाव एक ही है – पाप से बचने, संयम रखने और तप/व्रत को ठीक से निभाने का संकल्प।
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4. बहुत सरल भाषा में
“जैन पाचखान संकल्प” का मतलब है:> मैं भगवान को साक्षी मानकर > एक निश्चित समय/दिन के लिए > अपने भोजन-पान, चलन-फिरन, बोलचाल और मन के ऊपर > संयम रखने का पक्का नियम (संकल्प) लेता हूँ।
यदि आपको किसी विशेष पचक्खाण (जैसे – नवकारशी का, पोर्सी के बाद का, उपवास/तिविहार का, अठाई का आदि) का पूरा पाठ और अर्थ चाहिए, तो उसका नाम अलग से लिखें, मैं वही संकल्प का मूल पाठ और सरल अर्थ बता दूँगा।