can pooja be done on parmatma if aangi is done Give shastra proof
संक्षेप में:
- परमात्मा की पूजा (भाव–भक्ति) तो हर समय हो सकती है – चाहे आँगी हो या न हो।
- मूर्ति को छूकर की जाने वाली द्रव्य‑पूजा (जल, चन्दन, अक्षत आदि से) – यह आमतौर पर आँगी के बाद उसी प्रतिमा पर दोबारा नहीं की जाती, यह देवालय की मर्यादा से निषिद्ध मानी जाती है।
अब थोड़ा विस्तार से, सरल भाषा में:
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1. आँगी क्या है और क्रम क्या है?
परम्परागत जैन मंदिर‑मर्यादा (दोनों परम्पराएँ – श्वेताम्बर और दिगम्बर) में क्रम सामान्यतः यह होता है:
- स्नात्र / अभिषेक
- अष्टप्रकारी पूजा (जल, चन्दन, पुष्प/अक्षत, नैवेद्य, दीप, धूप आदि)
- उसके बाद आँगी / अलंकार (चन्दन‑केसर आदि से, कुछ स्थानों पर वस्त्र‑आभूषण आदि)
- फिर आरती, मंगल दीवो, स्तवन, चैत्यवन्दन आदि भाव‑भक्ति
इस क्रम से ही “प्रमाण” लिया जाता है – शास्त्र और आचार‑ग्रन्थों में आँगी हमेशा पूजा के बाद आती है, पहले नहीं, और आँगी के बाद फिर से वही द्रव्य‑पूजा बताई नहीं गयी।
जैननॉलेज की आँगी सम्बन्धी मार्गदर्शिका में भी यही लिखा है कि आँगी प्रायः स्नात्र/अभिषेक के बाद और आरती से पहले की जाती है; मतलब – पहले पूजन, फिर आँगी, फिर आरती‑भक्ति। आप चाहें तो यह संक्षिप्त मार्गदर्शन यहाँ देख सकते हैं: “Things to take care during Aangi”
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2. आँगी के बाद पूजा – क्या मान्य है?
(क) जो हमेशा मान्य है
आँगी के बाद आप उसी भगवान के सामने यह सब आराम से कर सकते हैं:- दर्शन, नमस्कार
- स्तोत्र, स्तवन, भजन
- चैत्यवन्दन, स्वाध्याय
- आरती, मंगल दीवो
(ख) जो सामान्यतः नहीं किया जाता
आँगी के बाद उसी मूर्ति पर दोबारा:- जल‑अभिषेक
- नव‑आंग चन्दन‑केसर से
- अक्षत आदि लगा कर अष्टप्रकारी द्रव्य‑पूजा
यह सब अमूमन नहीं किया जाता, क्योंकि:
- इससे आँगी तुरन्त बिगड़ जाती है – यह देवालय‑मर्यादा के विरुद्ध है।
- पूजा‑पद्धति (पूजा‑पद्धति, श्रावकाचार, मंदिर‑मर्यादा पत्र आदि) में यही निश्चित क्रम है –
“पहले द्रव्य‑पूजा, फिर आँगी, और फिर केवल भाव‑भक्ति।”
यदि किसी को फिर से अभिषेक/अष्टप्रकारी पूजा करनी ही हो, तो सामान्य नियम है:
- पहले आँगी साफ़‑सुथरे ढंग से हटाई जाती है,
- या कुछ मन्दिरों में अलग स्नात्र‑प्रतिमा रखी जाती है, जिस पर दिन में कई बार अभिषेक हो सकता है।
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3. “शास्त्र‑प्रमाण” के रूप में क्या माना जाए?
ध्यान रहे:
- मूल आगम (सूत्र) अधिकतर तत्त्व और सामान्य भक्ति बताते हैं –
- विस्तृत नियम – कब अभिषेक, कब पूजा, कब आँगी, क्या क्रम, क्या न करें –
इसीलिए, व्यवहार में “शास्त्र‑प्रमाण” का अर्थ यहाँ यह होता है:
- पूजा‑पद्धति ग्रन्थों में निश्चित क्रम –
स्नात्र → अष्टप्रकारी पूजा → आँगी → आरती / भक्ति। बीच में आँगी के बाद पुनः जल‑पूजा का वर्णन नहीं है – यही इसका सबसे साफ़ प्रमाण माना जाता है।
- देवालय‑मर्यादा – लगभग सभी जैन संघों के मन्दिर‑नियम पुस्तकों में
यह स्पष्ट निर्देश मिलता है कि आँगी के बाद प्रतिमा पर जल आदि से छेड़छाड़ न की जाये, केवल भाव‑भक्ति की जाये।
दोनों परम्पराएँ (दिगम्बर और श्वेताम्बर) इस बुनियादी मर्यादा में समान हैं – फर्क केवल आँगी की शैली, रंग‑रूप और वस्त्र‑आभूषण की मात्रा में हो सकता है, न कि इस सिद्धान्त में कि द्रव्य‑पूजा पहले, आँगी बाद में।
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4. आपके प्रश्न का सीधा उत्तर
> “क्या आँगी होने के बाद परमात्मा की पूजा की जा सकती है? शास्त्र‑प्रमाण?”
- हाँ – भाव से की जाने वाली पूजा/भक्ति तो पूरी तरह की जा सकती है
- नहीं – आँगी लगी उसी मूर्ति पर दोबारा द्रव्य‑पूजा (जल, चन्दन, अक्षत से) करना
इसलिए व्यवहारिक निष्कर्ष:
- परमात्मा की भक्ति कभी बन्द नहीं होती;
- बस मन्दिर‑मर्यादा के अनुसार आँगी के बाद केवल भाव‑पूजा हो,