Aadhinath janm kalyanak
आदिनाथ जनम कल्याणक (आदेशनाथ / ऋषभदेव भगवान) का संक्षिप्त व सुंदर वर्णन:
- जन्म तिथि (तिथि व स्थान)
- प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) का जन्म - चैत्र कृष्ण नवमी को हुआ माना जाता है - जन्म स्थान: अयोध्या नगरी, जिसे जैन ग्रंथों में विनीता भी कहा गया है - पिता: राजा नाभिराय - माता: रानी मरूदेवी
- १४ स्वप्न (माता मरूदेवी के शुभ स्वप्न)
जैन परंपरा के अनुसार, किसी भी तीर्थंकर के जन्म से पहले उनकी माता को १४ शुभ स्वप्न आते हैं। माता मरूदेवी ने भी ये १४ स्वप्न देखे – इससे ज्ञात हुआ कि उनके गर्भ में महापुरुष, भविष्य के तीर्थंकर का आयागमन हुआ है।
- इन्द्र द्वारा जन्म कल्याणक महोत्सव
- जन्म के समय इन्द्र आदि देवों ने अत्यन्त हर्ष के साथ स्नात्र पूजा व जनमोत्सव मनाया। - भगवान को सुमेरु पर्वत (मेरु) पर ले जाकर अभिषेक किया गया – यही परंपरा आज भी हम जन्म कल्याणक स्नात्र पूजा के रूप में करते हैं।
- मुख्य महत्व क्या है?
- भगवान आदिनाथ को आदिश्वर / आदिनाथ इसलिए कहते हैं क्योंकि - वे इस अवसर्पिणी काल के पहले तीर्थंकर हैं - उन्होंने ही मनुष्य समाज को - खेती, व्यापार, लिपि (लिखना-पढ़ना), गणित, सामाजिक व्यवस्था आदि जीवन जीने की बुनियादी विधियाँ सिखाईं। - उनका जन्म कल्याणक हमें याद दिलाता है कि - समृद्धि, राज्य, परिवार – सब नश्वर हैं - असली कल्याण धर्म, आत्मचिंतन और अहिंसा में है।
- दिगम्बर – श्वेताम्बर परंपरा
- दोनों परंपराएँ उन्हें ही पहले तीर्थंकर मानती हैं। - जन्म स्थान व माता‑पिता के नाम पर भी दोनों की मान्यता समान है। - तिथियों की गणना और काल (कितने वर्ष पहले) की संख्या में थोड़े मतांतर हो सकते हैं, पर - चैत्र कृष्ण नवमी, - अयोध्या / विनीता, - राजा नाभि और रानी मरूदेवी – ये आधार समान रूप से मान्य हैं।
- आज हम जन्म कल्याणक कैसे मनाते हैं?
साधारण रूप से जैन समाज में – - स्नात्र पूजा, विशेष रूप से आदिनाथ जन्म कल्याणक स्नात्र - अभिषेक, शांतिधारा - स्वाध्याय – आदिनाथ भगवान का चरित्र, तप एवं उनकी शिक्षाओं का श्रवण - दान, पूजा, प्रतिक्रमण, संयम का विशेष पालन - बहुत लोग इस दिन अनेक उपवास, एकासन, ब्यालु, आदि तप भी करते हैं।
आदिनाथ भगवान के जीवन और उनके तीर्थंकर बनने की पूरी कथा, जन्म से निर्वाण तक, आप विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं: