Samyag samyag samyag
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“Samyag samyag samyag” सुनते ही सबसे पहले जैन धर्म का रत्नत्रय याद आता है:
- सम्यग् दर्शन (सही श्रद्धा)
- सम्यग् ज्ञान (सही ज्ञान)
- सम्यग् चारित्र (सही आचरण)
कई बार भक्त या प्रवचन में “सम्यग्, सम्यग्, सम्यग्” बोलकर यही भाव लेते हैं कि हमारा दर्शन भी सम्यक् हो, ज्ञान भी सम्यक् हो, और आचरण भी सम्यक् हो – तीनों एक साथ शुद्ध हो जाएँ।
सरल अर्थ में:
- “सम्यग्” = जैसा वास्तव में है, वैसा सही-सही देखना, समझना और जीना
- मिथ्या से हटकर सत्य की ओर, भ्रम से हटकर आत्मा की ओर
इसी को शास्त्र में कहा है कि सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र – मोक्ष मार्ग हैं। आप रत्नत्रय पर और पढ़ना चाहें तो यहाँ देख सकते हैं