यह माया है, जैन के लिए शोभनीय नहीं है
आपने बिल्कुल सही बात कही।
जैन दृष्टि से “माया” (छल‑कपट, दिखावा, धोखा देना) कषायों में आती है – क्रोध, मान, माया, लोभ। ये चारों ही आत्मा को बाँधने वाले बड़े दोष माने गए हैं, इसलिए जैन साधक के लिए “माया‑कपट” शोभनीय नहीं है।
- आगमों में और अधार पापस्थान सूत्र में भी “आठवाँ माया” – छल/कपट को पापस्थान (पाप का कारण) माना गया है।
- समायिक, प्रतिक्रमण आदि सब साधनाएँ भी इसी लिए हैं कि क्रोध‑मान‑माया‑लोभ कम होते‑होते समाप्त हो जाएँ।
जैन के लिए आदर्श मार्ग यह है कि
- मन में कपट न हो,
- वचन में सीधापन (आर्जव) हो,
- और व्यवहार में सच्चाई व सरलता हो।
इसलिए “यह माया है, जैन के लिए शोभनीय नहीं है” – यह वाक्य जैन सिद्धांत के बिल्कुल अनुरूप है।