by there is not anysankat mohan in jain dharam pl tell in hindi
जैन धर्म में “संकट मोचन” जैसे देव या भगवान की मान्यता क्यों नहीं है – इसे बहुत सरल भाषा में समझते हैं:
- जैन धर्म का मूल सिद्धांत – कर्म का राज
- जैन दर्शन कहता है कि हर सुख‑दुख, संकट‑समस्या का कारण हमारे अपने कर्म हैं। - कोई भी देव, तीर्थंकर या भगवान आकर हमारे कर्म सीधा काट नहीं सकते। - वे केवल मार्ग दिखाते हैं, रास्ता बताते हैं; चलना हमें खुद होता है।
- तीर्थंकर क्या करते हैं?
- तीर्थंकर भगवान “उद्धारक” या “संकट मोचन” इस अर्थ में नहीं हैं कि वे हाथ से हमारा संकट हटा दें। - वे हमें यह सिखाते हैं कि: - क्रोध, मान, माया, लोभ छोड़ो - अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह अपनाओ - सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र से जीवन बदलो - इन गुणों को अपनाने से कर्म हल्के होते हैं, और संकट अपने आप कम होते जाते हैं।
- देव‑पूजा का उद्देश्य क्या है?
- जैन धर्म में हम देव (अरिहंत, सिद्ध आदि) की स्तुति‑वंदना करते हैं, - ताकि उनके गुण याद रहें, - और हम भी वैसा बनने की प्रेरणा लें। - हम उनसे यह नहीं माँगते कि “मेरा पाप काट दो, संकट हटा दो”; - क्योंकि यह जैन कर्म‑सिद्धांत के विरुद्ध है।
- संकट से मुक्ति का जैन तरीका
जैन धर्म कहता है कि संकट से निकलने के ये रास्ते हैं: - अपने भीतर का क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या कम करना - संयमित आहार, संयमित व्यवहार - प्रार्थना और स्वाध्याय से मन को स्थिर रखना - जीव‑दया, परोपकार, दान आदि से शुभ भाव बढ़ाना - और सबसे ज़रूरी – कर्मों की ज़िम्मेदारी खुद लेना
- निष्कर्ष
- इसलिए जैन धर्म में “संकट मोचन” नाम से कोई विशेष देव नहीं है, - क्योंकि यहाँ सिद्धांत है: “संकट को मोचन कोई और नहीं करता, अपने सही प्रयास से स्वयं जीव ही करता है।”
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