Sudarshan shresth bhagwaan k darshanarth
लगता है आप “Sudarshan (Parshvanath) Bhagwan ke darshanarth” कोई छोटा, शुद्ध पाठ चाह रहे हैं। पार्श्वनाथ प्रभु के “सुदर्शन” रूप के दर्शन में परंपरानुसार उवसग्गहरं (Uvasaggaharam) स्तोत्र सबसे उपयुक्त माना गया है। दर्शन से पहले-आगे आप ऐसे करें:
- मंदिर-प्रवेश से पहले मन-देह की शुद्धि रखें, नवकार मंत्र बोलें, विनम्रतापूर्वक प्रणाम करें।
- पार्श्वनाथ प्रभु के सामने उवसग्गहरं की गाथाएँ श्रद्धा से पढ़ें; यह “उपसर्ग-हर” (कष्ट-निवारक) स्तोत्र है।
उवसग्गहरं — मूल पाठ (प्रथम 2 गाथाएँ) 1) उवसग्गहरं पसं, पसं वंदामि कम्मघण-मुक्कं। विसहर-विसभयहरं, मंगलकल्लाण आवासं॥1॥
2) समणं कमठ्ठठाणं, आहिणं चउविह दवणं। सव्वेसिं पत्ठि ठाणं, वंदामि पासं जिनेंदं॥2॥
सरल अर्थ 1) मैं उपसर्ग-हरण करने वाले, कर्म-घन को नष्ट करने वाले, विष और भय का नाश करने वाले, मंगल-कल्याण के निवास पार्श्वनाथ प्रभु को वंदन करता/करती हूँ। 2) जो समनों के आराध्य, नागों के पूज्य, चतुर्विध संघ के आधार, सबके शरणदाता हैं—ऐसे जिनेन्द्र पार्श्वनाथ प्रभु को मैं वंदन करता/करती हूँ।
दर्शन भाव (संक्षेप)
- “हे पार्श्वनाथ प्रभु! आपके दर्शन से मेरे मिथ्यात्व, क्रोध-मान-माया-लोभ क्षीण हों, सम्यग्दर्शन दृढ़ हो, और सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चरित्र की वृद्धि हो। मैं आपके गुणों का चिंतन कर शुभभावना धारण करता/करती हूँ।”
परंपरा-नोट
- श्वेतांबर और दिगंबर—दोनों परंपराओं में पार्श्वनाथ प्रभु के लिए उवसग्गहरं स्तोत्र प्रसिद्ध है; पाठ-रूप में लघु-भेद (पदच्छेद/गणना) मिलते हैं, पर भाव एक ही—उपसर्ग-निवारण और शुद्ध-भाव की स्थापना।
- दर्शन-विधि (प्रदक्षिणा, पंचांग प्रणाम, शांत भाव से स्तुति) का सार दोनों में समान है।
उपयोगी संदर्भ