Namojinanam Mandir Dekhte Nahin bolane Se Kitna Danda Aata Hai
संक्षेप में उत्तर: जैन धर्म में “नमो जिनाणं” एक आदरपूर्ण वन्दन है; यह बोलना पुण्य का कार्य है। लेकिन किसी को “मन्दिर मत देखो/दरशन मत करो” कहकर देव-दर्शन या पूजा में रोकना बहुत गम्भीर दोष माना गया है। यह “अन्तराय कर्म” (देव‑पूजा/दरशन में बाधा) का बन्ध कराता है। इसके लिए शास्त्रों में कोई तय “जुर्माना/कितने दण्ड” (गणना या पैसे) नहीं दिया गया है; प्रायश्चित्त ही उपाय है—यह गुरु‑आज्ञा और अपनी क्षमता के अनुसार किया जाता है, संख्या निश्चित नहीं होती।
क्या करें (सरल प्रायश्चित्त):
- आलोकना–प्रतिक्रमण करें; शीघ्र क्षमायाचना करें।
- जिन्हें रोका था उनसे विनयपूर्वक क्षमा माँगें; आगे से ऐसा न कहने का प्रत्याख्यान लें।
- नमोकार मंत्र भाव से जपें; भाव (शुद्ध नीयत) सबसे महत्त्वपूर्ण है।
- सम्भव हो तो स्वयम् देव‑दरशन करें और दूसरों के पुण्य‑कार्य में सहयोग दें—बाधा नहीं।
परम्परागत दृष्टि:
- श्वेताम्बर और दिगम्बर—दोनों परम्पराएँ देव‑पूजा/दरशन में बाधा को घोर दोष (अन्तराय) मानती हैं; प्रायश्चित्त की विधि/क्रम में कुछ अन्तर हो सकता है, पर भाव और उद्देश्य एक ही है।
नोट:
- “दण्ड” शब्द का एक अर्थ काल‑मान भी है (1 दण्ड ≈ 24 मिनट); यदि आपका प्रश्न समय‑मापन के “दण्ड” पर था, तो उसका यह अर्थ होता है—पर यह यहाँ “सजा/फाइन” जैसा नहीं है।