अचल और अटल रुप किस का है
जैन दर्शन में “अचल और अटल रूप” केवल शुद्ध आत्मा का है—विशेषकर जब आत्मा पूर्णतः कर्म-मुक्त होकर सिद्ध पद (मोक्ष) प्राप्त कर लेती है। सिद्ध भगवान का स्वरूप नित्य, अविकारी, अचल-अटल और शुद्ध आनन्दस्वरूप माना गया है। संसार के सभी पदार्थ (शरीर, पदार्थ, परिस्थितियाँ आदि) परिवर्तनशील हैं; इसलिए उनमें “अचल-अटल” नहीं कहा जाता। यह बात दिगंबर और श्वेतांबर—दोनों परंपराओं में समान रूप से मानी जाती है।
- अचल-अटल स्वरूप: कर्म-क्षय के बाद सिद्ध आत्मा
- परिवर्तनशील: देह और पुद्गल से बने सभी जगत के पदार्थ
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