Athai ka subhay ka pachkan
अठाई (8 दिन का तप) – सुबह का पचकाण
सरल/व्यवहारिक पचकाण (हिंदी): “अरिहंत-सिद्ध-आचार्य-उपाध्याय-साधु परमेष्ठियों को नमस्कार कर, मैं आज से आठ दिन की ‘अठाई’ तपस्या का पचकाण करता/करती हूँ। इन आठ दिनों में मैं नियमपूर्वक उपवास/जितना निश्चय किया है उतना त्याग रखूँगा/रखूँगी, असातना से बचूँगा/बचूँगी, समता बनाए रखूँगा/रखूँगी, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय व प्रभुभक्ति करूँगा/करूँगी। जाने-अनजाने हुए दोषों के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ। मेरे नियम में किसी प्रकार की ढिलाई न हो—ऐसी शक्ति प्रदान करें।”
यदि आप पूर्ण उपवास (निर्जल/सजल) ले रहे हों तो साथ में स्पष्ट बोलें: “मैं अठाई के आठों दिनों में अमुक प्रकार का उपवास रखूँगा/रखूँगी (जैसे: निर्जल/सजल/एगासना/बेयसना), सूर्य उदय के बाद कुछ ग्रहण नहीं करूँगा/करूँगी, रात्रिभोजन नहीं करूँगा/करूँगी, और सम्यक् आचरण रखूँगा/रखूँगी।”
मुख्य बातें:
- पचकाण सूर्योदय से पहले, प्रातः प्रातिक्रमण/समायिक के बाद लें।
- गुरुजी/साधु-साध्वी की अनुमति में लेना उत्तम; अन्यथा जिनालय या घर के जिनप्रतिमा/ग्रंथ के सम्मुख लें।
- अपनी देह-शक्ति और स्वास्थ्य के अनुसार ही प्रकार (निर्जल/सजल/एकासन/बेयासन) स्पष्ट कर लें।
- प्रतिदिन प्रातः-सायं क्षमा-याचना, स्वाध्याय और समता का अभ्यास रखें।
परंपरागत भिन्नता:
- श्वेतांबर और दिगंबर परंपराओं में पचकाण के शब्द/शैली में अंतर हो सकता है, पर भाव एक ही है—नियमपूर्वक तप, संयम और आराधना का संकल्प। अपनी परंपरा में प्रचलित पाठ वैसे ही बोलें।
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