कायोत्सर्ग किसलिए किया जाता है?
कायोत्सर्ग क्यों किया जाता है?
- देह-त्याग के भाव से आत्मा में स्थित होने के लिए: “मैं शरीर नहीं, शुद्ध आत्मा हूँ”—इस दृढ़ भावना का अभ्यास है।
- कषायों (क्रोध, मान, माया, लोभ) को शांत करके परिणामों की शुद्धि हेतु।
- समवर और निर्जरा के लिए: नए कर्मों का बंधन रोकना और बंधे हुए कर्मों का क्षय समर्थ बनाना।
- समता (समायिक) की दृढ़ साधना, क्षमा‑मैत्री के भाव को जाग्रत करने के लिए।
- नियमित क्रियाओं में—समायिक, प्रतिक्रमण, चैत्यवंदन, तप/उपवास के समय—ध्यान को स्थिर व शुद्ध रखने के लिए।
- अंतकाल में भी शांत‑समाधि के लिए इसका विशेष महत्त्व बताया गया है।
कैसे किया जाता है (संक्षेप में):
- खड़े (खड़ियासन) या बैठे रहकर शरीर को बिल्कुल अचल, ढीला व सहज छोड़ देना, दृष्टि नीचे, श्वास सामान्य।
- मन को देह से हटाकर आत्मा के स्वरूप पर स्थिर करना; नमोकार, लोगस्स, अथवा पारंपरिक कायोत्सर्ग‑सूत्रों के साथ शांत ध्यान।
परंपरागत भेद:
- श्वेतांबर परंपरा: प्रायः प्रतिक्रमण/चैत्यवंदन में लोगस्स आदि के साथ अल्प अवधि का Kayotsarga किया जाता है।
- दिगंबर परंपरा: 6 आवश्यकों में प्रमुख साधना; दीर्घकाल तक स्थिर रहकर कायोत्सर्ग, और साधु‑संन्यासियों के 28 मूलगुणों से संयुक्त भाव‑साधना के रूप में इसका विशेष अभ्यास होता है।
लाभ (आध्यात्मिक दृष्टि से):
- देह‑भान शिथिल होकर चित्त स्थिर होता है, समता बढ़ती है, पापकर्मों की निर्जरा में सहायता मिलती है, और अंतरंग शांति व सजगता विकसित होती है।
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