देव गति मे जाने के कारण
देव-गति (देव लोक) में जन्म के मुख्य कारण
- पुण्य का प्रबल बन्ध: दान, शील, तप, पूजा, विनय, सेवा, दया, क्षमा, मधुर-वचन आदि से शुभ (पुण्य) कर्म बँधते हैं, जिनसे देव-गति मिलती है।
- मंद कषाय: क्रोध, मान, माया, लोभ का क्षीण/मंद होना। तीव्र कषाय से देव-गति नहीं, बल्कि निम्न गतियाँ आती हैं।
- शुद्ध भावनाएँ: देव‑गुरु‑शास्त्र भक्ति, सम्यक् दर्शन, अनुव्रत–गुणव्रत–शिक्षाव्रत का पालन, सामायिक, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय आदि।
- शुभ लेश्या और शुद्ध परिणाम: शान्त, प्रसन्न, अहिंसक और निरहंकारी मानसिकता।
- उपयुक्त अघातिया कर्मों का बन्ध: देव‑आयु, श्रेष्ठ देव‑नाम, उत्तम गोत्र आदि का पुण्य‑बन्ध।
महत्त्वपूर्ण बातें
- देव-गति बहुत सुखद है, पर वहाँ मोक्ष नहीं होता; मोक्ष के लिए मनुष्य-गति ही श्रेष्ठ मानी गई है।
- देव-गति का कारण पुण्य है, पर यदि पुण्य आसक्ति और इन्द्रिय-सुख की कामना से बँधा है, तो वह आगे फिर संसार में ही घुमाता है; इसलिए पुण्य भी वैराग्य और सम्यक् भाव से बाँधना उचित है।
परम्परागत दृष्टि
- दिगम्बर और श्वेताम्बर—दोनों परम्पराएँ मानती हैं कि देव‑गति का कारण मुख्यतः पुण्य‑कर्म और मंद‑कषाय हैं; साधना‑मार्ग और विवरणों में सूक्ष्म भेद हो सकते हैं, पर तत्त्व एक ही है।
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