तीसरे देवलोक से आगे कोनसा वेद है?
जैन सिद्धांत के अनुसार “तीसरे देवलोक” (सनत्कुमार से आगे) में देवलोकों में देह-संबंधी संभोग (काय-प्रवीचार) नहीं होता। वहाँ “वेद/भोग” चार प्रकार से क्रमशः होते हैं:
- स्पर्श से: सनत्कुमार–महेन्द्र तक
- रूप (दर्शन) से: ब्रह्मा–कापिष्ठ तक
- शब्द (संगीत) से: शुक्र–सहस्रार तक
- मनः (केवल मानसिक चिन्तन) से: आनत–अच्युत तक
और सोलहवें कल्प से ऊपर (ग्रैवेयक तथा अनुत्तर विमान) में काम-इच्छा ही नहीं रहती — वहाँ कोई वेद-भोग नहीं होता।
यह व्यवस्था तत्त्वार्थसूत्र (उभय सम्प्रदायों—दिगम्बर व श्वेताम्बर—द्वारा मान्य) में बताई गई है। देवलोकों की सरल जानकारी के लिए देखें: