चक्रवर्तियों की निधियां एवं उनके कार्य
जैन परंपरा में चक्रवर्ती को दिग्विजय के पश्चात गंगा के पश्चिमी तट पर तप करने पर “नव-निधियाँ” सिद्ध होती हैं। ये दैवी निधियाँ चल-अचल कोश जैसे साथ रहती हैं और उनसे चक्रवर्ती को राज्य-व्यवस्था, समृद्धि और लोक-उपकार के कार्य सहज बनते हैं।
चक्रवर्तियों की 9 निधियाँ और उनके कार्य
1) नैसर्प (नैसर्पा) निधि
- गाँव-नगर, मंडप, दुर्ग, पड़ाव आदि का तुरन्त निर्माण कराने की सामर्थ्य देती है।
2) पाण्डुक (पाण्डुक/पाण्डुकि) निधि
- मान–उन्मान–प्रमाण (तोले-माप) का ज्ञान कराती है; अन्न–बीज तथा विविध धान्य उत्पन्न कराती है।
3) पिंगल (पिंगलक) निधि
- मनुष्यों और पशुओं के सर्व प्रकार के आभूषणों की रचना–निर्माण का ज्ञान तथा सामग्री देती है।
4) सर्वरत्न (सर्वरत्नक) निधि
- बहुमूल्य रत्न उपलब्ध कराती है; अनेक ग्रंथों में इसे चक्रवर्ती के 14 रत्नों की उपलब्धि का भी हेतु कहा गया है।
5) महापद्म (पद्म) निधि
- शुद्ध एवं रंगीन वस्त्रों का उत्पादन, रंगाई–धुलाई और परिधान-सज्जा की समस्त साधन-सामग्री देती है।
6) काल (काल-निधि)
- भूत–वर्तमान–भविष्य के अनुकूल कर्म, कृषि, कला, व्याकरण आदि का व्यापक ज्ञान कराती है; औचित्य के अनुसार उपकरण उपलब्ध कराती है।
7) महाकाल निधि
- स्वर्ण, रजत, मोती, प्रवाल, लौह आदि धातु–रत्नों की खानें और धातु–उत्पादन उपलब्ध कराती है।
8) माणव (माणवक) निधि
- युद्धनीति–दण्डनीति का ज्ञान, कवच–ढाल–खड्ग आदि विविध आयुधों और सैन्य-सामग्री की सिद्धि कराती है।
9) शंख (शंखनिधि)
- नृत्य, गीत, वादन, नाट्य–काव्य आदि कलाओं का ज्ञान तथा वाद्य–सामग्री प्रदान करती है।
अतिरिक्त परंपरागत विवरण
- प्रत्येक निधि विशाल रत्नमयी मंजूषा के रूप में मानी गई है, जिनके अधिष्ठाता नागकुमार देव होते हैं। ये निधियाँ चक्रवर्ती की राजधानी के निकट भूमिगत साथ चलती हैं और आवश्यकतानुसार साधन–ज्ञान उपलब्ध कराती हैं।
- नामों में लघु भिन्नताएँ मिलती हैं: जैसे महापद्म/पद्म, पिंगल/पिंगलक, सर्वरत्न/सर्वरत्नक; और वर्णनों में भी सूक्ष्म भेद मिलते हैं कि सर्वरत्न केवल रत्न देती है या चौदह रत्नों की प्राप्ति का भी कारण है।
श्वेतांबर–दिगंबर संदर्भ
- दोनों परंपराएँ “नव-निधि” मानती हैं; नामों/सूक्ष्म कार्य-वर्णन में हल्का भेद पाया जाता है, पर सार एक ही है—ये निधियाँ निर्माण, अन्न–वस्त्र, अलंकार, रत्न–धातु, शास्त्र–कला, आयुध–रणनीति और संगीत–नाट्य जैसे लोककल्याणकारी साधनों की स्वयंसिद्ध उपलब्धि कराती हैं।
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