1 upvas. Ka fal
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1 उपवास (Upvaas) का फल
- मुख्य फल: आत्मा की शुद्धि (निर्जरा) और पाप कर्मों का क्षय. उपवास को बाह्य तप में “अंशन्” माना गया है; यह राग-द्वेष को घटाता है, संयम बढ़ाता है, और मोक्ष–मार्ग में प्रगति कराता है।
- पुण्य: शुद्ध भाव से किए गए एक उपवास से श्रेष्ठ पुण्य का बंध होता है, जिससे शुभ जन्म, मानसिक शांति, और धर्म में दृढ़ता जैसी सद्फलनाएं मिलती हैं। जैन आगमों में इसके फल का संख्यात्मक आकलन नहीं दिया—फल भाव और नियमपालन पर निर्भर है।
- आवश्यक भाव: सम्यक् दृष्टि, अहिंसा–भाव, स्वाध्याय, सामायिक/प्रतिक्रमण, मैत्री–भावना के साथ किया उपवास सबसे अधिक फलदायी होता है। केवल भोजन न छोड़कर मन-वचन-काया की पवित्रता भी निभानी चाहिए।
- परम्परागत भेद:
संक्षेप: एक सच्चे, नियमबद्ध उपवास का फल है—कर्मों का क्षय, संयम की वृत्ति, और उत्तम पुण्य; यही मोक्ष–मार्ग की साधना को पुष्ट करता है, भौतिक लाभ की अपेक्षा से नहीं, आत्म–शुद्धि की भावना से।
उपवास के अर्थ, प्रकार और पचक्खण (पच्चखन) हेतु: