चक्रवर्ती की नौ निधियां के नाम एवं उनके कार्य
जैनागम के अनुसार चक्रवर्ती के पास “नव निधियाँ” होती हैं। इनके नाम और कार्य संक्षेप में:
- नैसर्प (निसर्प) निधि — ग्राम, नगर, भवन, मंडप आदि का तत्काल निर्माण कराती है; सेना के पड़ाव की सारी सामग्री जुटाती है।
- पाण्डुक (पांडुक) निधि — तोल-माप के साधन उपलब्ध कराती है और धान्य‑बीज की विपुल उत्पत्ति कराती है।
- पिंगलक (पिंगल) निधि — मनुष्य तथा हाथी‑घोड़े आदि के आभूषण और उनके निर्माण की विधि उपलब्ध कराती है।
- सर्वरत्न निधि — चक्रवर्ती के चौदह रत्नों की उत्पत्ति में साधक बनती है; बहुमूल्य रत्नों की प्राप्ति का हेतु भी है।
- महापद्म निधि — सभी प्रकार के वस्त्र, उनकी धुलाई‑रंगाई और सम्पूर्ण परिधान‑सज्जा उपलब्ध कराती है।
- काल (कालनिधि) — विविध बर्तनों, अनेक शिल्प‑कलाओं का ज्ञान, तथा भूत‑भविष्य के शुभ‑अशुभ का बोध कराती है।
- महाकाल निधि — स्वर्ण‑रजत‑हीरा‑मूंगा आदि रत्न‑धातुओं की खानें प्रकट कराती है।
- माणवक (मानव) निधि — सभी अस्त्र‑शस्त्रों की सामग्री, युद्धनीति और राज्यनीति का ज्ञान कराती है।
- शंख निधि — नृत्य‑नाटक, काव्य और विविध वाद्यों की पूर्ण विधि‑विद्या प्रदान करती है।
परम्परा‑भेद:
- दिगंबर और श्वेतांबर परम्पराओं में नाम‑रूप में हल्का भेद (जैसे नैसर्प/निसर्प, पिंगलक/पिंगल, माणवक/मानव, काल/कालनिधि) मिलता है, पर अर्थ व कार्य समान ही माने जाते हैं।
संबंधित पढ़ाई: चक्रवर्ती के 14 रत्नों पर संक्षिप्त लेख देखें: