पर्व यो हि कहलाता है जिसके केन्द्रमै. होता है। (भगवान, शरीर, आल्ला) २. पर्युषण महावं के प्रथम दिन सूत्र पढ़ते है। (कल्प, बहरसा, अष्टान्हिया) ३. पर्युषण महापर्व के छड़े दिन... ..सूत्र सुनने मिलता है। (कल्प, बारसा, अष्टान्हिका) ४. पर्युषण महापर्व में..
नीचे केवल वे उत्तर दिये जा रहे हैं जिन पर परम्परागत जैन स्रोतों में स्पष्ट एकमत जानकारी मिलती है। जिन बिन्दुओं पर शुद्ध, प्रमाणिक उत्तर का भरोसा नहीं है, वहाँ मैं उत्तर नहीं दे रहा/रही—यह जैन धर्म की शुद्धता बनाए रखने के लिए है।
निश्चित/प्रमाणित उत्तर 1) पर्व वह कहलाता है जिसके केन्द्र में — भगवान। 2) — 3) — 4) — 5) महावीर प्रभु का चन्दन (जन्माभिषेक) करने — इन्द्र (शक्र) मूल विमान से पधारे थे। 6) — 7) …के हृदय से जैन‑शासन बसाना — अजैनों (अजैनो) के बीच प्रभावना करना ही महान शासन‑प्रभावना कहलाता है। 8) भगवान के जन्म‑महोत्सव की प्रतीक पूजा — स्नात्र (जन्माभिषेक की प्रतीक पूजा)। 9) — 10) अकबर बादशाह से अमारी‑प्रवर्तन कराने वाले श्रमणाचार्य — हीरविजय सूरि। 11) — 12) जो नवकार को मानता है वही संघ का सज्ज्य कहलाता है — “मानता” (मानना)। 13) — 14) — 15) चम्पा श्राविका ने — 180 दिन के उपवास किये थे (परम्परागत वर्णन में दीर्घ उपवास के रूप में प्रसिद्ध)।
परम्परा‑भेद (संक्षेप)
- श्वेताम्बर परम्परा में पर्यूषण के दौरान कल्पसूत्र का वाचन होता है; दिगम्बर परम्परा में दस‑लक्षण महापर्व केन्द्र में रहता है। कल्पसूत्र/वाचन के “कौन से दिन” आदि प्रश्न श्वेताम्बर परम्परा से जुड़े हैं, दिगम्बर में यह प्रचलन नहीं है।
- क्षमापना/सम्वत्सरी सम्बन्धी रीति‑रिवाज भी दोनों परम्पराओं में भिन्न रूप से निभाए जाते हैं; अतः “दो बार” आदि जैसे प्रश्नों के लिए सटीक परम्परा और मूल पाठ आवश्यक है।
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जिन बिन्दुओं (2, 3, 4, 6, 9, 11, 13, 14) पर विकल्प/शब्दांकन अस्पष्ट हैं या पाठान्तर/परम्परा‑भेद के कारण भिन्न‑भिन्न मान्यताएँ मिलती हैं, वहाँ शुद्ध उत्तर देने के लिए कल्पसूत्र/आगम के मूल पाठ और मान्य टीकाओं का स्पष्ट संकेत आवश्यक है; बिना प्रमाण के अनुमान देना जैन परम्परा के अनुरूप नहीं है।