Dashvaikalika sutr पापकरी आचरण एवं कल्याणकारी आचरण को किस प्रकार (माध्यम) से जाना जाता है ???
दशवैकालिक सूत्र का स्पष्ट उत्तर:
माध्यम – श्रवण (जिनवाणी/आगम का सुनना), जिससे ज्ञान उत्पन्न होता है।
मूल पंक्तियाँ (प्राकृत): 1) “पढमं नाणं तओ दया, एवं चिट्ठइ सव्वसंजए। अन्नाणी किं काही, किं वा नाहीइ सेय‑पावगं॥10॥” 2) “सोच्चा जाणइ कल्लाणं, सोच्चा जाणइ पावगं; उभयं पि जाणइ सोच्चा, जं सेयं तं समायरे॥11॥”
सरल अर्थ (अर्थ):
- पहले ज्ञान, फिर दया/आचरण। बिना ज्ञान के मनुष्य पुण्य‑पाप (कल्याणकारी‑पापकरी) का भेद कैसे जानेगा? (गाथा 10)
- श्रवण से ही कल्याणकारी और पापकरी आचरण का ज्ञान होता है; दोनों को सुन‑समझकर जो कल्याणकारी है, उसी का आचरण करना चाहिए। (गाथा 11)
परम्परा संबंधी संकेत:
- यह शिक्षाएँ श्वेतांबर आगम ग्रंथ “दशवैकालिक सूत्र” में आती हैं। दिगंबर परंपरा में भी सिद्धान्त यही है कि सही ज्ञान से ही आचरण का निर्णय होता है; मतभेद अर्थ में नहीं है, केवल ग्रंथ‑परंपरा अलग है।
सार: पापकारी और कल्याणकारी आचरण का ज्ञान—जिनवाणी का श्रवण करके, उससे उत्पन्न सम्यक् ज्ञान के माध्यम से—और फिर वही करना जो श्रेयस्कर हो।