Dashvaikalika sutr mai sadhu muniraj ki tulna kis chorendriy prani ke saath ki gayi hai ???
दशवैकालिक सूत्र में साधु-मुनिराज की तुलना चौरिन्द्रिय प्राणी “भ्रमर (भँवरा)” से की गई है।
मूल गाथा (प्राकृत): “जहा दुमस्स पुप्फेसु, भमरो आवियड़ रसं। नय पुप्फं किलामेइ, सो य पीणेड़ अप्पयं॥”
सरल अर्थ (परम्परागत): जैसे भँवरा अनेक फूलों से थोड़ा‑थोड़ा मधु लेता है बिना फूल को क्षति पहुँचाए, वैसे ही मुनि ‘माधुकरी वृत्ति’ से अनेक घरों से अल्प मात्र में निर्दोष आहार ग्रहण करते हैं, किसी पर भार नहीं डालते और अहिंसा का पालन करते हैं।
परम्परा-टिप्पणी:
- यह उपमा श्वेताम्बर आगम दशवैकालिक सूत्र के प्रथम अध्याय में आती है।
- दिगम्बर परम्परा में भी “माधुकरी” (अनेक गृहों से अल्प आहार) का आदर्श स्वीकार है, यद्यपि मूल ग्रन्थ-स्वीकृति भिन्न है; अर्थ और साधुचर्या का भाव समान है।