kathityao dharma kriya karne me kitne antaraya karte hai
संक्षेप में: हाँ, धर्म-कर्म (धर्म क्रिया) करते समय पाँच antarāya होते हैं।
- दान Antarāya (दान करने में बाधा)
- लाभ Antarāya (लाभ पाने में बाधा)
- भोग Antarāya (खाने-पीने आदि भोगों में बाधा)
- उपभोग Antarāya (जो非भोग भी) भोग में बाधा
- वीर्य Antarāya (शक्ति/उर्जा से प्रयास करने में बाधा)
इन पाँचों की वृष्टि से व्यक्ति चाहकर भी दान नहीं कर पाता, लाभ नहीं प्राप्त कर पाता, या ईश्वर-आराधना/धार्मिक कर्मों में बाधा अनुभव करता है। यह पाँचों Antarāya ghati karma के उप-वर्ग हैं और Tattvārthasūtra के 8.13 के अनुसार यह वही पाँच प्रकार हैं। दोनों संप्रदाय (श्वेताम्बर और दिगंबर) इन पाँचों को मानते हैं, कुछ विवरणों में शब्द-व्याख्या में हल्का अंतर दिख सकता है but मूल विचार समान है। You can read more here
संक्षिप्त अर्थ ( arth ):
- Antarāya का तात्पर्य है कर्म जो किसी कार्यक्रम (जैसे दान देना, आय, भोग, आदि) को सफलतापूर्वक होने से रोकता है।
- पाँच प्रकारों से पता चलता है कि कैसे अंदर से होने वाले अवरोध कर्म सीधे क्रिया-फल, धर्म-आचरण और आत्म-चेतना को प्रभावित करते हैं। (Digambar/Shvetambar में अवधारणा एक जैसी है; भाषा-तर्क में थोड़ा-बहुत शब्द-संयोजन अलग हो सकता है।)