पंचम काल में मनुष्य का कल्याण कैसे होगा ?
जैन दृष्टि से पहले यह समझना ज़रूरी है कि
- हम अवसर्पिणी के पंचम काल (दुःषमा / पंचम आरा) में हैं।
- इस काल में भारत क्षेत्र से मोक्ष नहीं होता – न कोई तीर्थंकर जन्म लेते हैं, न कोई जीव यहीं से सिद्ध बनता है।
- लेकिन आत्मिक कल्याण असंभव नहीं, बस उसका रूप अलग होता है।
1. “कल्याण” का अर्थ – इस पंचम काल में
इस काल में मनुष्य का मुख्य कल्याण ये हो सकता है:
- सम्यक् दर्शन (सच्चा श्रद्धा) की प्राप्ति
- सद्यः मोक्ष का कारण-भूत पुण्य व भावों का संचय – ताकि आगे के भविष्य में
- या तो महाविदेह क्षेत्र में जन्म मिले और वहीं से मोक्ष हो - या फिर अच्छे मनुष्य / देव गति में जन्म लेकर आगे साधना सहज हो सके
- कषायों की तीव्रता कम करना – राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ को धीरे-धीरे हल्का करना
- धर्म-परायण जीवन – जहां तक संभव हो, नियमपूर्वक धार्मिक आचरण
2. पंचम काल में मोक्ष सीधे क्यों नहीं?
जैन शास्त्रों के अनुसार:
- पंचम काल में
- परन्तु महाविदेह क्षेत्र में अभी भी तीर्थंकर, केवलज्ञानी और मोक्ष – सब चल रहा है।
- यहाँ (भारत में) हम जो भी शुद्ध भाव, तप, दान, संयम, जप–साधना करते हैं, वह आगे चलकर हमें
इसी विषय से जुड़ा एक सरल विवरण आप यहाँ पढ़ सकते हैं और पंचम काल के बारे में यहाँ
3. व्यवहारिक रूप से “कल्याण” के उपाय
पंचम काल के मनुष्य के लिए कल्याण का मार्ग संक्षेप में:
- सम्यक् दर्शन की साधना
- मिथ्यात्व (गलत मान्यता) छोड़कर - आत्मा, कर्म, पुनर्जन्म, मोक्ष आदि तत्त्वों में निश्चयपूर्वक श्रद्धा करना - आचार्य, उपाध्याय, साधु, जिनवाणी की शरण लेना
- व्रत–अनुव्रत, मर्यादा, संयम
- पंच अनुव्रत, समयिक, प्रोषधोपवास, सामायिक, स्वाध्याय, परेशह सहन - शक्य हो तो दिगम्बर परंपरा में दिगम्बराचार / श्वेताम्बर परंपरा में श्रावकाचार आदि ग्रंथों में बताए हुए व्रत–नियमों का पालन
- तप और दान
- अनशन, उपवास, एकासन, बियासन, नवरात्रि नहीं, बल्कि जैन आयम्बिल, उपवास, आदि तप - साधु-संत, जिनालय, शास्त्र, शिक्षा आदि के लिए शुद्ध भाव से दान
- अहिंसा पर विशेष बल
- मन, वचन, काया से हिंसा को कम से कम करना - आहार, व्यापार, व्यवहार – सब में अहिंसा और अपरिग्रह की दिशा में चलना
- निरन्तर आत्मचिंतन
- “मैं कौन हूँ? – देह नहीं, आत्मा हूँ” – इस भाव का बार-बार स्मरण - क्रोध, मान, माया, लोभ के उठते ही स्वयं को टोकना – “ये मेरे शत्रु हैं, इन्हें पोषित नहीं करना”
4. निष्कर्ष
- हाँ, पंचम काल में भी मनुष्य का कल्याण हो सकता है,
अर्थात् – अभी सीधा मोक्ष नहीं, पर मोक्ष की पूर्ण तैयारी और पक्की नींव – यही पंचम काल के मनुष्य का सच्चा कल्याण है।