Tell me the Story of Rishab Bhagvaan in Hindi
रिषभ भगवान (आदिनाथ) की कथा – सरल हिन्दी में
1. जन्म और परिवार
- रिषभदेव या आदिनाथ वर्तमान कालचक्र (अवसर्पिणी) के पहले तीर्थंकर हैं।
- उनका जन्म अयोध्या (विनीता नगरी) में राजा नाभि और रानी मरूदेवी के घर में हुआ।
- जन्म से ही उनके शरीर में महापुरुषों के लक्षण थे, इसलिए उनका नाम रखा गया “ऋषभ” (सर्वश्रेष्ठ, प्रधान)।
- वे इक्ष्वाकु वंश के आदिपुरुष माने जाते हैं।
2. स्वप्न और अलौकिक चिन्ह
- रानी मरूदेवी ने गर्भधारण के समय 14 शुभ स्वप्न देखे (हाथी, बैल, सिंह, लक्ष्मी, माला, चन्द्र, सूरज, ध्वज आदि)।
- इन स्वप्नों का अर्थ यह था कि गर्भ में आने वाला बालक महान तीर्थंकर बनेगा, जो अनन्त जीवों को मुक्ति का मार्ग बताएगा।
3. युवावस्था, विवाह और राज्य शासन
- युवावस्था में रिषभदेव भगवान का विवाह हुआ। प्रमुख रानियाँ – सुमंगल़ा और सुनन्दा बताई जाती हैं।
- परम्परा से –
- वे पहले चक्रवर्ती जैसे महान सम्राट बने; न्यायपूर्वक राज्य चलाया, प्रजा का हित किया, हिंसा रहित शासन दिया।
4. संसार को जीने की रीति सिखाई पुराने कल्प में कल्पवृक्ष से सब कुछ स्वयं मिल जाता था। जब कल्पवृक्ष समाप्त होने लगे, तब लोगों को जीवन जीने का तरीका मालूम नहीं था – खेती कैसे करें, व्यापार कैसे करें, घर–समाज कैसे चलाएँ।
तब रिषभदेव भगवान ने मनुष्यों को –
- पुरुषों को 72 कलाएँ (विद्याएँ),
- स्त्रियों को 64 कलाएँ
विशेष रूप से:
- पुत्री ब्राह्मी को और उसके द्वारा समाज को – लिपि / लेखन की विद्या।
- पुत्री सुन्दरी को और उसके द्वारा समाज को – अंकगणित / गणित की विद्या।
इसलिए रिषभदेव को केवल धर्म–मार्गदर्शक ही नहीं, बल्कि सभ्यता और संस्कृति के प्रथम आचार्य भी कहा जाता है। आप यह बात और विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं
5. वैराग्य (विरक्ति) की उत्पत्ति
- बहुत समय तक राज्य और गृहस्थ धर्म को पूर्ण रूप से निभाने के बाद, एक दिन उद्यान (उपवन) में खेल–क्रीड़ा के समय भगवान के हृदय में गहन वैराग्य जगा।
- उन्होंने देखा – यौवन, धन, राज्य, सम्बन्ध – सब नश्वर हैं; आज हैं, कल नहीं रहेंगे।
- इसी से उनके चित्त में संसर से ऊब और मोक्ष की तीव्र इच्छा उत्पन्न हुई।
6. राज्य–त्याग और दीक्षा
- रिषभदेव भगवान ने अपना समस्त राज्य, धन–वैभव पुत्रों में बाँट दिया –
- इसके बाद उन्होंने केश लोचन कर के, नग्न (दिगंबर) अवस्था में, सब कुछ छोड़कर मुनि दीक्षा ग्रहण की –
7. प्रारंभिक कठिनाई – आहार की कथा
- उस समय किसी को यह पता ही न था कि मुनि को कैसे भोजन देना, क्या देना, कितनी विनम्रता और मर्यादा से देना है।
- परिणाम यह हुआ कि भगवान रिषभदेव बहुत समय तक निर्जल–निर्भक्ष (बिना जल–भोजन) रहे।
- अनेक नगरों में गए, पर किसी ने उचित गोचरी/आहार नहीं दिया, क्योंकि धर्म–मर्यादा का ज्ञान ही नहीं था।
फिर उनके परप्रपौत्र श्रेयान्स कुमार ने पूर्व–स्मरण (पूर्वभाव की स्मृति) से समझा कि मुनि को किस प्रकार भक्ति से आहार दिया जाता है।
- उन्होंने भगवान को ईक्षुरस (गन्ने का रस) का आहार कराया।
- यह घटना पहला आहार (पहली गोचरी) मानी जाती है, जिसे हम अक्षय तृतीया के रूप में भी स्मरण करते हैं।
8. तपस्या और केवलज्ञान
- दीक्षा के बाद रिषभदेव भगवान ने अत्यन्त कठोर तप, ध्यान, संयम किया।
- उन्होंने अन्तरंग कषायों (क्रोध, मान, माया, लोभ) को जीतने के लिए सालों–साल उपवास, ध्यान, विहार, मन–संयम किया।
- अन्ततः उन्होंने केवलज्ञान (अनन्त ज्ञान) प्राप्त किया और तीर्थंकर जिन बने –
9. देशना और संघ की स्थापना केवलज्ञान प्राप्त होने पर भगवान की समवशरण सभा बनी, जहाँ देव, मनुष्य, तिर्यंच सभी उनकी देशना सुनने लगे। उन्होंने –
- सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र (त्रिरत्न) का उपदेश दिया,
- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह – इन पंचव्रतों की व्यवस्था की,
- और चार संघ स्थापित किए –
यही से जैन संघ की परम्परा चल पड़ी, जिसे आगे के 23 तीर्थंकरों ने और पुष्ट किया।
10. मोक्ष (निर्वाण)
- अपना शेष जीवन वे उपदेश, विहार और तप में बिताते रहे।
- अन्त में भगवान रिषभदेव ने अष्टापद पर्वत (कई परम्पराओं में इसे कैलास से जोड़ा जाता है) पर मोक्ष प्राप्त किया।
- वहाँ उनकी सिद्ध अवस्था हुई – जहाँ जन्म–मरण, कर्म, दुख, सबका पूर्ण अन्त हो जाता है।
11. दिगंबर–श्वेताम्बर परम्परा के अन्तर
- दोनों परम्पराएँ रिषभदेव को पहले तीर्थंकर के रूप में मानती हैं।
- दोनों में – जन्म–स्थान अयोध्या, माता–पिता के नाम, पुत्र भरत–बहुभली, पुत्रियाँ ब्राह्मी–सुन्दरी, केवलज्ञान, अष्टापद पर निर्वाण आदि मुख्य बातें समान हैं।
- कुछ विवरणों में अन्तर हो सकता है – जैसे
12. रिषभदेव भगवान से मिलने वाली सीख (सार)
- जीवन का उद्देश्य केवल भोग नहीं, स्व–उद्धार और मोक्ष है।
- पहले सम्यक आचरण से आदर्श गृहस्थ–जीवन जीना, फिर समय आने पर संयम–मार्ग अपनाना – यही आदर्श क्रम है।
- सभ्यता, कला, ज्ञान – सबका अन्तिम लक्ष्य भी आत्म–शुद्धि और अहिंसा होना चाहिए।
- जो इन्द्रियों और कषायों पर विजय पा ले, वही सच्चा विजेता (जिन) है।
यही संक्षेप में रिषभ भगवान / आदिनाथ भगवान की परम्परागत जैन कथा है, जो जैन आगम, पुराण (विशेषकर आदिपुराण आदि) और जैन आचार्यों के ग्रंथों में वर्णित है।