Maran samaye kyo var kaam n ave?
“मरण समये क्यो ‘वर’ काम न आवे?” — इसका सीधा जैन उत्तर है: मरण के क्षण में कोई संबंधी, धन, शरीर, पद, मान–सब निरुपयोगी हो जाते हैं; केवल अपना ही कर्म और उस समय का भाव (उपयोग) काम आता है।
मुख्य बातें
- कर्म व्यक्तिगत है: किसी का पति/पत्नी, परिवार, मित्र—कोई भी आपके कर्म का भाग नहीं बाँट सकता; जो बँधा है, उसका फल आत्मा अकेली भोगती है।
- देह और संपत्ति यहीं छूट जाती है: देह-अनुकूल साधन, बैंक-धन, प्रतिष्ठा—सब देह-पर्यंत हैं; आत्मा अगले जन्म में केवल अपने कर्म-निर्णीत परिणाम लेकर जाती है।
- अंतिम क्षण का भाव निर्णायक है: उस समय शान्त, निरस्पृह, त्रिरत्न-युक्त भाव (सम्यक् दर्शन–ज्ञान–चरित्र) हो तो शुभ गति/उन्नति होती है; कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ) से भाव अशुभ बनता है।
- समधी-मरण/सल्लेखना आदर्श है: पूर्व-साधना और वैराग्य से शुद्ध उपयोग में देह-त्याग—यही जैन परंपरा में सर्वोत्तम माना गया है।
दोनों परंपराओं की दृष्टि
- दिगम्बर और श्वेताम्बर—दोनों में सिद्धान्त समान है: मरण-काल में बाहरी सहारा नहीं, केवल अपने कर्म और उपयोग सहायक होते हैं। आचार-विधि/पदावली में भिन्नता हो सकती है, पर तत्त्व निष्कर्ष एक ही है।
जीवन में क्या करें ताकि मरण-क्षण उपयोगी बने
- दैनिक समायिक, प्रत्याख्यान, कायोत्सर्ग और प्रातिक्रमण से कषाय क्षीण करें।
- पंच परमेष्ठी स्मरण और नवकार जाप से चित्त निर्मल रखें।
- अहिंसा, अपरिग्रह, सत्य आदि व्रतों का पालन; क्षमा-भाव, मैत्री-भाव को बढ़ाएँ।
- मृत्यु-विज्ञान को समझें: देह-त्याग के बाद आत्मा अपने कर्मानुसार तुरंत नई गति में प्रविष्ट होती है—इसलिए वर्तमान क्षण का शुद्ध भाव ही वास्तविक “सहारा” है।
सार: मरण-समय कोई “वर/व्यक्ति” काम नहीं आता; काम आता है—अपना शुद्ध उपयोग, घटी कषाय, और संचित धर्म-पुरुषार्थ। यही जैन धर्म का शाश्वत सिद्धान्त है।