Pani ka pachkan
“Pani ka Pachkan” (पानी का पच्खन) का अर्थ
- Pachkan = समयबद्ध संकल्प/व्रत (Pratyakhyan) लेना।
- “पानी का पच्खन” = पानी के उपयोग को नियमबद्ध करना: केवल उकाले‑छाना हुआ पानी, केवल दिन में, और निर्धारित समय/सीमा के भीतर; या निश्चित अवधि तक बिल्कुल पानी न लेना (जैसे चौवीहार में).
मुख्य रूप 1) चौवीहार में पानी का पच्खन (सूर्यास्त के बाद जल वर्जित)
- सरल पारंपरिक वचन (लोकप्रचलित, समय भरें):
2) केवल उकाला‑छाना जल (दिन में सीमित)
- सरल पच्खन:
ध्यान रखने योग्य बातें
- पानी सदैव उकाला (उबालकर ठंडा) और छाना हुआ लें; यथाशक्ति दिन‑में‑ही।
- पच्खन में अवधि, समय, और अपवाद (जैसे औषधि) स्पष्ट बोलें।
- देव‑गुरु‑शास्त्र के सामने, या ज्ञानी‑वृद्ध की साक्षी में लें।
- रात्रि में जल से परहेज सूक्ष्म जीवों की अहिंसा हेतु है।
श्वेतांबर और दिगंबर परंपरा
- दोनों परंपराओं में “पच्खन/प्रत्याख्यान” का भाव एक ही है: समयबद्ध संयम।
- श्वेतांबर गृहस्थ आम तौर पर दिन में उकाला‑छाना जल लेते हैं; सूर्यास्त के बाद जल वर्जित (चौवीहार).
- दिगंबर गृहस्थ भी दिन‑में ही उकाला‑छाना जल का नियम रखते हैं; रात्रि में जल वर्जित. औषधि‑संबंधी अपवाद स्वास्थ्य के अनुसार गुरु‑मार्गदर्शन से।
आध्यात्मिक भाव
- सूक्ष्म जीवों की अहिंसा, इंद्रियनिग्रह, सावधानी (प्रमाद का त्याग), और अंतर्मुख साधना का अभ्यास।
संबंधित सरल सामग्री/उदाहरण
- चौवीहार का पच्खन:
- “केवल पानी के साथ” उपवास का पच्खन (उकाला जल):
- नवकारशी/भोजन‑पूर्व पच्खन से संबंधित जानकारी:
- विभिन्न तपों के पच्खन के उदाहरण:
टिप्पणी
- शब्दावली/वाक्य‑रचना क्षेत्र/परंपरा अनुसार बदल सकती है; अपने गुरु/संघ के अनुसार ही उच्चारण और नियम ग्रहण करें।