Athai ka suruday ka pachkan
नीचे “अठाई (8 दिन)” शुरू करने के लिए सरल, प्रचलित (श्वेताम्बर परम्परा) का छोटा पचकाण – और समापन (पूरा करने) का छोटा पचकाण – दिए जा रहे हैं. कृपया अपने आचार्य/संघ के अनुसार उच्चारण व नियम निश्चित करें, क्योंकि पाठ-पद्धति भिन्न हो सकती है.
1) अठाई आरम्भ का पचकाण (सुरू‑दिवस) – मूल भावार्थ सहित छोटा पाठ “इच्छामि अठाईं तप करूं. आज से आठ दिवस तक उपवास/एकासन (जो नियम ले रहा/रही हूँ) का पालन करूँगा/करूँगी. सूर्यास्त के बाद आहार नहीं करूँगा/करूँगी, विषय‑भोगों से विरत रहूँगा/रहूँगी, संयम, स्वाध्याय, समायिक‑प्रतिक्रमण का पालन करूँगा/करूँगी. जो दोष हो, मिच्छामि दुक्कडं.”
अर्थ: मैं आठ दिन के अठाई तप का संकल्प लेता/लेती हूँ—नियत नियमों का कठोरता से पालन करूँगा/करूँगी; गलती हो जाए तो क्षमा चाहता/चाहती हूँ.
2) अठाई पूर्ण होने पर पचकाण (समापन) “इच्छामि अठाईं तप पूर्ण करूँ. आज पवित्र भाव से पारणा करूँगा/करूँगी. क्रोध‑मान‑माया‑लोभ से दूर रहकर शुद्ध आहार लूँगा/लूँगी. नियमों की रक्षा हुई हो तो मंगल; दोष हुए हों तो क्षमा—मिच्छामि दुक्कडं.”
संक्षिप्त मार्गदर्शन
- “उपवास” या “एकासन/आयम्बिल”—जो भी नियम ले रहे हैं, आरम्भ के पचकाण में स्पष्ट उच्चारित करें.
- पचकाण प्रातः, आरम्भ के पहले; और समापन का पचकाण पारणा से पहले बोलना उत्तम माना गया है.
- सम्भव हो तो गुरु‑वंदन कर के, अथवा तीर्थंकर प्रतिमा/ग्रंथ के समक्ष संकल्प लें.
परम्परा अनुसार भिन्नता
- श्वेताम्बर और दिगम्बर परम्पराओं में शब्दावली/उच्चारण और नियमों का स्वरूप अलग‑अलग हो सकता है. अतः अपने आचार्य/संघ से जो अधिकृत पाठ मिलता है, उसी का अनुसरण करें.
अधिक सहायता/पाठ
भगवद्‑धर्म की शुद्धता बनी रहे—ऐसी भावनाएँ. मिच्छामि दुक्कडं.